राजेंद्र प्रसाद के बारे में, छात्र जीवन, प्रारंभिक जीवन, करियर, एक वकील के रूप में,शिक्षण सेवक के साथ जाने के लिए का महात्मा गांधी ने चंपारण

प्रारंभिक जीवन, करियर, एक वकील के रूप में
प्रारंभिक जीवन, करियर, एक वकील के रूप में

प्रारंभिक जीवन

 राजेंद्र प्रसाद बिहार के सीवान जिले के जे राधाई में एक धनी और धनी कायस्थ हिंदू और पैदा हुए थे उनके पिता महादेव सहायक संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं के विद्या अविद्या थे उनकी मां बमलेश्वरी देवी एक धर्म परायण महिला थी जो रामायण और महाभारत से लेकर उनके पुत्र तक की कहानियां सुनाती थी व्हाट्सएप से छोटे बच्चे थे और उनकी एक और उनका एक बड़ा भाई था और तीन बड़ी बहनें थी उनकी मां की मृत्यु हो गई जब तब वह एक छोटे उनकी बड़ी बहन तब से उनकी देखभाल करती  थी

 छात्र जीवन

 जब प्रसाद 5 वर्ष के थे तो उनके माता-पिता ने उसे एक फारसी भाषा हिंदी और अंक गणित सीखने के लिए एक कुशल मुस्लिम विद्वान मौलवी के संघर्षण में रखा प्रारंभिक परंपरा परंपरा प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें छपरा जिला स्कूल भेजा प्रेसिडेंट कॉलेज कोलकाता गया इस बीच जून 8 9 6 में 12 वर्ष की कम उम्र में उनका  

विवाह राजवंशी देवी से हुआ

 फिर वह अपने बड़े भाई महेंद्र प्रसाद के शातिर पटना के टीके घोष एकेडमी में 2 साल की अवधि के लिए अध्ययन करने गए उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया और उसे शीघ्र छात्र के रूप में प्रतिमा 30 प्रसाद 19th मे प्रेसिडेंट कॉलेज कोलकाता में शुरू में एक विज्ञान के छात्र के रूप में शाम शामिल हुए उन्होंने मार्च 9 4 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की तरह से पास किया और फिर मार्च में 1905 में वहां से प्रथम श्रेणी में स्नातक किया उनकी बुद्धि से प्रभावित होकर एक परीक्षार्थी ने एक बार उनके उत्तर पुस्तिका पर टिप्पणी की कि परीक्षा से बेहतर है बाद में उन्होंने का कला के अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया और अपने करियर की शुरुआत दिसंबर 19 और टो मेक कॉल का कोलकाता

 मैं अपने भाई के साथ रहते थे एक संपर्क के छात्र और साथी एक सर्वजनिक कार्यकर्ता वर्ल्ड डांस उषा सोसायटी के सदस्य थे या उनके परिवार और शिक्षा के प्रति कर्तव्य की भावना के कारण था कि उन्होंने सर्वेंट ऑफ़ इंडिया सोसाइटी में शामिल होने से इनकार कर दिया क्योंकि उस समय के दौरान था जब उनकी मां की मृत्यु हो गई थी उसके साथ ही उनकी बहन 19 वर्ष की आयु में विधवा हो गई थी और उन्हें अपने माता-पिता के घर लौट आए पटना कॉलेज के छात्र संगठन और बिहार के महत्वपूर्ण नेताओं नेताओं से पहला संगठन आंदोलन और असहयोग आंदोलन की भूमिका निभाई संगठन ने आगामी वर्षों में बिहार को राजेंद्र राजनैतिक नेतृत्व प्रदान किया

 करियर

 राजेंद्र प्रसाद ने एक शिक्षक के रूप में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सेवा की अर्थशास्त्र में अपने पूरा करने के बाद वह कम से अंग्रेज अंग्रेज फोटोग्राफी एवं गए लॉक लॉन्ग टर्म सिंह कॉलेज के मदारपुर बिहार आय प्रिंसिपल बनने के लिए पर चला गया हालांकि बाद में उन्होंने कानूनी अध्ययन करने के लिए कॉलेज छोड़ दिया और रिपन कॉलेज कोलकाता और सुरेंद्र ला कालेज में प्रवेश किया 1909 में कोलकाता में अपनी कानून की पढ़ाई के दौरान उन्होंने कोलकाता सिटी कॉलेज के अर्थशास्त्र में फोटो प्रोफेसर प्रोफेसर के रूप में भी काम किया 1915 में प्रसाद ने मास्टर इन इन लॉ की परीक्षा दी परीक्षा उत्तर और स्वर्ण पदक जीता उन्होंने से डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी की 1958 विश्वविद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय

 एक वकील के रूप में

 1916 में वह बिहार और ओडिशा के उच्च न्यायालय मैं शामिल हो गए 1917 में उन्हें पटना विश्वविद्यालय के सीनेट और क्रिकेट के पहले सदस्यों में से एक रूप से नियुक्त किया गया था उन्होंने बिहार के प्रसिद्ध रेशम शहर भागलपुर में कानून का अभ्यास भी की प्रभावित ने उन्हें एक मार्गदर्शन और गुरु के रूप में पाया अपने कई लेखों में उन्होंने शंकर प्रियांशी के साथ अपनी मकान मुलाकात के बारे में बताया और संस्कृत के साथ उनकी बैठकों के बारे में बताया उन्होंने क्रांतिकारी प्रकाशन सर्च लाइट और देश के लिए लेख लिखें 

इन पत्रों के लिए धन एकत्र किए उन्होंने व्यापक रूप से रूप के दौरा किया व्याख्या व्याख्या और स्वतंत्र आंदोलन के सिद्धांतों का प्रचार किया उन्होंने बिहार और बंगाल की आई 1914 की बाढ़ से प्रभावित लोगों की मदद करने के सक्रिय भूमिका निभाई जब 15 जनवरी 1904 को बिहार के भूकंप आया तो भूकंप आया तो प्रसाद जेल में थे उस अवधि के दौरान वह अपने करीबी सहयोगी अनु अनुग्रह नारायण सिंह आर के पास राहत कार्य के लिए गए उन्हें दो दिन बाद रिहा कर दिया गया

 बिहार केंद्रीय समिति का गठन

जनवरी को बिहार केंद्रीय समिति का गठन किया और प्रभावित लोगों की मदद के लिए धन जुटाने का काम किया 30 मई 1905 को भूकंप के बाद जब उन्हें सरकार ने आदेश के कारण देश छोड़ने से मना किया तो उन्होंने अपनी अध्यक्षता मे सिंह और पंजाब समिति के स्थापना की  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ प्रसाद ने पाला संवाद कोलकाता के आयोजित 1996 सत्र के दौरान था

जहां उन्होंने कोलकाता के अध्ययन के दौरान स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया औपचारिक रूप से वह वर्ष 1911 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए जब कोलकाता में फिर से वार्षिक सत्र आयोजित किया गया तो 1916 में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में लखनऊ अधिवेशन के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी से मुलाकात की चंपारण में एक तथ्य खोज मिशन के दौरान महात्मा गांधी ने उन्हें अपने शिक्षण सेवक के साथ जाने के लिए का महात्मा गांधी ने चंपारण साहस और दृढ़ विकास के साथ समय वह इतने आगे बढ़ गए थे

जैसे सहयोग के प्रस्तावित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा पारित किया गया 1920 में उन्होंने अपील की अपने आकर्षक करियर के के लिए और अपने साथी विश्वविद्यालय में अपने कार्यकर्ताओं का पालन किया पुराने गाने द्वारा अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद से अपनी पढ़ाई छोड़ने और खुद को बिहार विद्यापीठ में दाखिला दिलाने के लिए मांग करते हुए प्रति पश्चिमी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार बहिष्कार करने का अध्ययन किया शालीनता आंदोलन के दौरान उन्हें राहुल संस्कार पिया के साथ एक लेखक और प्रा पाली मत के साथ बातचीत की राहुल शंकर स्त्री प्रसाद के बौद्धिक शक्तियों 

  बहिष्कार करने का अध्ययन

उन्हें अक्टूबर 1904 में मुंबई शास्त्र के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुना गया वह फिर से अध्यक्ष बने जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1998 इस्तीफा दे दिया 8 अगस्त 1902 में कांग्रेस के मामले में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया जिसके कारण भारतीय नेताओं की गिरफ्तारी उन्हें पटना के सदाकत आश्रम के गिरफ्तार किया गया और 1 की पूर्व सेंट्रल जेल भेज दिया गया लगभग 3 वर्षों तक रहने के बाद 15 जून 1905 को उन्हें रिहा कर दिया गया 2 दिसंबर 1906 को जवाहरलाल नेहरू ने नेताओं के 12 नामित मंत्रियों की अंतरिम सरकार के गठन के बाद उन्हें और कृषि विभाग आवंटित किया गया उन्होंने 11 दिसंबर 1906 क्वेश्चन सभा के अध्यक्ष द्वारा चला गया था को सामान्य सभा के अध्यक्ष द्वारा चुने गए चुने गए थे 47 नंबर को जेबी कृपाली द्वारा अपने इस्तीफा सौंपने के बाद तीसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बने

                         धन्यवाद

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